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संस्मरण और दर साहब

  २ ० अक्तूबर १९६३ से १८ मई १९६९ - कुल ३०२७ दिन, ७२६४८ घंटे ४३५८८८० मिनट , २६१५३२८०० पल - सारे के सारे एक जैसे मिठास से ऒत प्रोत हैं ।भले ही समय बीतता जा रहा हो मगर एक सशक्त प्रकाश स्तम्भ की तरह उन सुनहरे पलों की रौशनी जीवन के रस्ते पर चमकती रहती है ..... उनकी जगमगाहट कभी कम नहीं हुई है।

आज आधी सदी बीत जाने के बाद भी वो एक लम्हा मेरे मन के यू-ट्यूब में अभी भी लगभग वैसे ही 'रिकार्डेड’ ' हैं . २ ० अक्टोबर १ ९ ६ ३ की शाम जब मैंने पहली बार नेतरहाट की जमीं पर कदम रखा था। एक ओर घर छोड़ने की उदासी थी तो तो दूसरी ओर छात्रावास में हो सकने वाले परेशानियों का ख़याल आ रहा था। मन एक दम विचलित था ।  किसी कारण मैं देर से दाखिले के लिए आया था ।

(चित्र :-1966- स्वतंत्रता दिवस/बायें से- श्री स्वरुप जी, श्री वासुदेवन जी, दर साहब एवं श्री मंगलदेव जी)

माँ मुझे छोड़ने आई थी । श्रीमान जीवन नाथ दर जी जो प्रधान जी थे, ने बड़े सम्मान के साथ हमें शैले में ठहराया। उन्हों ने बताया की थोड़ी देर बाद कैम्प फायर होने हा रहा था जिसमे विद्यालय के बच्चे मनोरंजन कार्य क्रम प्रस्तुत करने जा रहे थे । उन्हों ने हम सबों को भी साथ चलने का अनुरोध किया।

जबतक हम २ नंबर मैदान पर पहुंचे अँधेरा छा चुका था और आसमान तारों से खचाखच भरा हुआ था। हवा में पर्याप्त ठंढक व्याप्त हो चुकी थी। मैं ने अपनी माँ का आँचल कस कर पकड़ रखा था । मन में अनगिनत आशंकाएं उमड़ घुमड़ रही थी। फिर थोड़ी देर में विद्यालय के बालक आने शुरू हो गए और साथ साथ उन कोलाहल बढ़ने लगा. जब मैदान में कैम्प फायर जलाई गई तो लकड़ियों का पीला प्रकाश फैलने लगा और अँधेरा थोडा कम हुआ - बाहर भी और अन्दर भी। फिर कार्यक्रम शुरू हुआ और एक के बाद एक प्रस्तुतियां होने लगी। पूरा मैदान विद्यार्थियों के ठहाकों और टिप्पणियों से गूँजने लगा. ३ ६ ० विद्यार्थियों से आने वाला सामूहिक कम्पन मेरे मानस पर जबरदस्त असर डाल रहा था. धीरे धीरे माँ के आँचल की पकड़ कमजोर पड़ने लगी थी।

अन्त्वोगात्वा जब किशोरे जी आये थे (वो 6thyear के थे ) तो पूरा मैंदान उनके स्वागत में झूम उठा था । और उन्हों ने निराश नहीं किया था। उस समय की 'हिट' संगम का गाना 'ओ महबूबा तेरे दिल के पास ही है मेरी मंजिले मकसूद' का रेकोर्ड जब उन्हों ने उल्टा कर बजा दिया था और 'ओ बाबुहमे , रेते लदी के सपा ही है रिमे जिलेमन दसुकम ' गाया था तो बाकी विद्यार्थियों के साथ साथ मैं भी झूम उठा था और तालियाँ बजा रहा था। उस पल में एक बड़ी घटना घटित हुई।

माँ का आँचल छोड़ मैं उस पल में विद्यालय परिवार का हिस्सा बन गया था। मेरे अन्दर एक प्रकार की हीन भावना और संकोच और दब्बूपन बचपन से ही मेरे ऊपर हावी रही थी। आज जब मैं उस शाम को याद करता हूँ तो यह स्पष्ट रूप से ज्ञात होता है - वो मेरे जीवन का वो लम्हा था जब बदलाव शुरू हो गया था - एक ऐसा बदलाव जिसने आने वाले वर्षों में मेरे जीवन की दिशा बदल दी ।

फिर याद आता है नेतरहाट की पहली बारिश। बादलों को अपने पास से आते हुए पहली बार देखा था । बारिश बंद होने के बाद विद्यालय से लौट ते हुए दूर धुलि हुई पहाड़ों की चोटियाँ - नजदीक वाली हरी और दूर वाली क्रमशः नीली होती गयी थीं । प्रकृति के रंगों का यह खेल पहली बार देखा था । याद है मैं थोड़ी देर के लिए रुक गया था. मगर उस समय मेरे पास इस अनुभूति को व्यक्त करने के लिए शब्द नहीं थे ।

ओवल के मैदान पर पहली बार बीर बहुटियों को देखने का रोमांच आधी सदी गुजर जाने के बाद भी ताजा है। चीड़ के पत्तों से गुजरती हवाओं का संगीत आज भी कानो में गूंज जाते हैं । प्रेम आश्रम के कोने की रात रानी मेरे दिल की 'रानी' बनी बैठी है।

जीवन की इस अपराह्न बेल में कभी कभी ये यादें एक दम से समय में पीछे खींच ले जाती हैं और अनायास होठों पर आ जाता है।

"याद न जाए बीते दिनों की जा के न आये जो दिन उन्हें दिन क्यूं भुलाये

दिन जो पखेरू होते पिंजड़े में रख लेता पालता उनको जतन से सीने से रहता लगाए”।

अलोक सिन्हा , 10 बैच

(चित्र :-1966- स्वतंत्रता दिवस/बायें से- श्री स्वरुप जी, श्री वासुदेवन जी, दर साहब एवं श्री मंगलदेव जी)