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                              श्री दर का अनोखा व्यक्तित्व

 

श्री दर में दुर्लभ गुण थे।वे कभी किसी को डांटते नहीं थे, प्रत्येक व्यक्ति का सम्मान करते थे, किसी रोगी के बिछावन के नीचे यदि। पाखाना पेशाब पडा दिखता था तो उसे स्वयं उठाकर साफ कर देते थे।इससे उनके विरोधी भी अवाक रह जाते थे।खडी बोली राष्ट्रभाषा हिन्दी और बातचीत की अंग्रेजी दोनों पर उनका मातृभाषावत् अधिकार था।कहीं भी, किसी भी गोष्ठी में किसी भी विषय पर वे ऐसे स्वाभाविक ढंग से बोलते थे कि श्रोता मुग्ध हो जाते थे। वे समय निकालकर प्रत्येक आश्रम में , प्रत्येक कर्मचारी के यहाँ जाते थे और सबका सुख दुख पूछते थे।उनकी पत्नी स्वर्गीय श्रीश्रीमती कमला दर तो और भी विनम्र थीं।उनमें प्राचार्य की पत्नी होने का अभिभान तनिक भी नहीं था।वे पूरे पठार की माता जी थीं।घर-घर की घरनियों से मिलकर उनका कुशल-मंगल लेती रहती थीं।श्रीदर-दम्पति में मानवीयता कूट-कूटकर भरी हुई थी। इस रुप में प्रत्येक शिक्षक एवं छात्र आज भी उन्हें याद करते हैं।

श्रीदर प्रत्येक आश्रम में जाकर वहाँ के अध्ययन मंच, सफाई घर, शौचालय, स्नानघर, छात्र को मिली आलमारी के साथ वस्त्र-परिवर्तन घर, उसका बिछावन, बुकरैक वगैरह सब ठीक थे कि नहीं यह देखते थे।बच्चे जिस गिलास में दूध पीते थे, उसे साफ करके रखा गया है , या जूठा ही पडा है।बच्चे अपने हिस्से का ही फल खा चुके हैं या यों ही पडे-पडे फल सूख रहे हैं।छोटी-सी-छोटी बात पर दर साहब ध्यान देदेते थे। आश्रम निरीक्षण में श्रीदर के साथ निजी सचिव, कोषपाल, बढई, बिजली मिस्री आदि सब साथ रहते थे और छात्रों की जैसी शिकायत और जरूरत होती थी उसे निजी सचिव नोट करते थे और मिस्त्री तत्काल उसे दूर करकरके रिपोर्ट देते थे।श्रीमती दर भी उनके साथ रहती थीं।आश्रमाध्यक्ष और आश्रम माता तो साथ होते ही थे।

------ स्व. डॉ. रामदेव त्रिपाठी